माहवारी ! सामाजिक कुप्रथा ! एक मिथ्या! या एक लड़की के लड़की से औरत बनने का सफर ! या एक अभिश्राप या एक वरदान क्या है? सब कुछ है और कुछ भी नहीं। एक औरत का दर्द है। एक लड़की जो कोमल कली होती है उसके लिए यह महावारी एक पहेली की तरह होती हैं जो उसको अलग-अलग तरह से समझाया जाता | पर सच तो ये है कि ये माहवारी ना हो तो भी इन लड़को का जीवन बहुत कठिन है। समाज उसे इस रूप में भी स्वीकार नहीं करता है। इसलिए यह एक खूबसूरत एहसास है ना कि अभिषाय, ये तो वो पुण्य है जिससे एक औरत सृष्टि को जन्म देती है। मासिक धर्म यानि माहवारी एक औरत के जीवन चर्या का अभिन्न अंग है। इस विषय पर खुल कर बात करना जरूरी है ताकि यह विषय दुनिया के लिए अस्पृश्य न रह कर सामान्य ज्ञान की श्रेणी में आ सकें।
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माहवारी पर जब तक हम खुल कर चर्चा नहीं करेंगे तब तक यह समाज के लिए एक अस्पृश्य विषय बन कर रह जाएगा। और इसके लिए सबसे पहले हमे लैंगिक भेद मिटावा बहुत जरुरी है |
माहवारी के दिनों में तीन चीज अहम होती है जागरुकता, उपलब्धता और वहन करने की क्षमता । यानि संबंधित उत्पाद हर हाल में जरूरत मंद किशोरी, युवती और महिला को मिलने की सुनिश्चितता हो क्योंकि आज भी दूर दराज के इलाकों में महिलाएं इन दिनों के लिए काम आने वाले बैंड व कपड़े तक से वंचित है।
माहवारी कोई समस्या या बीमारी नहीं है। यह एक शारीरिक क्रिया है जिसके न होने से सृष्टि का निर्माण रुक जाएगा एक औरत का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। एक औरत को पूर्ण औरत बनाती है ये माहवारी”! यह होना पाप नहीं है पुण्य है। और हमें हमारे समाज को जागरूकता लानी होगी।
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पुरुष इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है लिंग भेद सबसे पहले समाप्त होना बहुत जरुरी है। जब भी हम टेलीविजन देखते है और जब सेनेटरी नैपकिन का कोई विज्ञापन आता है तो तुरनत हम चैनल बदल देते है। ऐसा क्यों? देखो उस विज्ञापन को और समझाओ बच्चों को यह क्या होता है। जब सेनेटरी नैपकिन लेने बाजार जाते हैं तो दुकानदार से बड़ा शर्माते हुए बोलते हैं या दुकान खाली होने का इन्तजार करते हैं जब कोई नहीं होगा तक मांगेंगे लेकिन इस बात पर शर्म क्यो? खुलकर इस विषय पर बोलो, चर्चा करो समझों और जो भी मिथ्या है दूर करो |
अचार खराब नहीं होता, मंदिर में दीया लगाने से या मंदिर जाने से मंदिर दूषित नहीं होता, बर्तन में खाना बनाना से खाने से बर्तन खराब नहीं होता यह सब मिथ्या है। माहवारी सिर्फ महिलाओं से जुड़ा मुद्दा नहीं है और ये भी मानना गलत है कि इसका सरोकार सिर्फ महिलाओं से है। यह एक मानवीय मुद्दा है जिसमें सबकी भागीदारी महत्वपूर्ण है। यह रिवाज महिलाओं को आराम देने के उद्देश्य से बनाया गया था क्योंकि इन दिनों में वो दर्द से गुजर रही होती है। ये माहवारी एक चार दिन की प्रक्रिया है जब हमारे शरीर से वो रक्त बाहर आता जो हर महीने एक अजन्मे बच्चे को माँ के गर्भाशय में सुरक्षा प्रदान करने के लिए एकर्त्रित हुआ परन्तु अंडे के निषेचित न होने के कारण काम में नहीं आया | इसलिए मासिक धर्म का होना अत्यन्त आवश्यक होता है। ‘भारत में आज भी कई ऐसी जगह है जहाँ पर जब एक लड़की जवानी की देहलीज पर कदम रखती है तो उसको एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है। उसके लिए तोहफे लाए जाते हैं। उसको माहवारी क़ो त्यौहार की तरह मनाते है | जबकि यह तो एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसमें पानी, स्वच्छता एवं साफ सफाई तीनों का अत्यन्त ध्यान रखना आवश्यक है।
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हाल ही यूं के के मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में किए गए एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अगर भारत में माहवारी उत्पादों के उपयुक्त निपटारे पर ध्यान दिया गया तो अगले पचास साल से भी कम अवधि में भारत में ऐसे कचरे के बोझ की समस्या से गंभीर रूप से दो चार होना पड़ेगा | अगर हमने वक्त पर इसको गंभीरता को नहीं समझा और इस महामारी में माहवारी से जुड़े मुद्दों और इनके समाधान के प्रयास नहीं किए तो समस्याएँ बढ़ेगी हो भले ही आधी आबादी बादकिस्मती से “शर्म और ‘साइलेंस” यानि “शर्म और चुप्पी” वाले इस विषय पर बात न करें। देखा जाए तो यह माहवारी एक औरत का गहना है, जिससे उसे मातृत्व सुख की प्राप्ति होती है। भगवान खुद पूरी सृष्टि की संरचना स्वयं नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने नारी की संरचना की और यदि किसी लड़की को मासिक धर्म नियमित रूप से नहीं आते हैं तो वो प्राकृतिक रूप से कभी माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर सकती है।
डॉ. पायल उपाध्याय
प्रोफेसर बिज़नस एडमिनिस्ट्रेशन
सचिव: वीमेन वेलफेयर आर्गेनाइजेशन ऑफ वर्ल्ड

