अरावली हमारी सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता और पारिस्थितिक तंत्र का घोतक है : डॉ. निधि  अरावली पर्वत माला को बचने के लिए जन हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत अरावली बचाओ देश बचाओ

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अरावली हमारी सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता और पारिस्थितिक तंत्र का घोतक है : डॉ. निधि

अरावली पर्वत माला को बचने के लिए जन हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत

अरावली बचाओ देश बचाओ

कोटा| 14 दिसंबर 2025| भारत की सबसे पुरानी लगभग 3 अरब साल पहले बनी अरावली पर्वतमाला श्रृंखला का अस्तित्व देश के सर्वोच्चय न्यायालय के एक निर्देश से संकट में आ गया है जिसमें अरावली की 100 मीटर से नीची ऊँचाई वाले पहाड़ों को पहाड़ नहीं मन जाएगा और फिर उस स्थान को खनन, कंस्ट्रक्शन आदि के लिए दिया जा सकेगा जबकि यदि अरावली की पूरी श्रृंखला को देखे तो उसमें 90 प्रतिशत पहाड़ 100 मीटर से नीचे है । ऐसे में अरावली पर्वत माला के अस्तित्व की रक्षा के लिए कोटा राजस्थान में रविवार को सोसाइटी हैस ईव शी इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा किशोर सागर तालाब की पाल पर कोटा के विभिन्न सामाजिक संस्थाओं साथ अरावली बचाओं जन हस्ताक्षर अभियान चलाया गया जिसमें यूनि कल्चर ट्रस्ट ऑफ इंडिया, वीमेन वेलफेयर आर्गेनाईजेशन ऑफ वर्ल्ड, राजस्थान राज्य भारत स्काउट एंड गाइड, अखिल भारतीय कौशिक गायत्री परिवार, सुभाष कला संगम, हम लोग, मानव कल्याण समिति राजस्थान कोटा, चम्बल संसद, ओन स्टेप नोबल फाउंडेशन, वरिष्ठ जन कल्याण समिति, कर्मयोगी संसथान, अखिल भारतीय क्षत्रिय महा सभा, कोटा डेवलपमेंट फोरम का योगदान रहा। संस्था अध्यक्ष डॉ. निधि प्रजापति ने बताया कि अरावली पर्वत श्रृंखला सनातन काल से देश की सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता और पारिस्थितिक तंत्र का सूचक रही है। यदि अरावली न होती तो सम्पूर्ण पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत रेगिस्तान होता और गंगा का मैदान न होता, क्योंकि यही पर्वतमाला रेगिस्तान के विस्तार को भारत में बढ़ने से रोकती है। यह 300 से अधिक जीव-जंतु और पक्षियों की प्रजाति का आश्रय स्थल और पशुपालकों के पशुओं के लिए चारागाह का साधन है । अरावली से बनास, साबरमती, लूणी जैसी नदियां निकलती है यदि अरावली का दोहन होता है तो पूरा पश्चिमी राजस्थान पानी के लिए तरस जाएगा। नीतू मेहता भटनागर ने बताया कि अरावली भारत के लिए जीवन रेखा की तरह है जिसने हजारों वर्षों से विदेशी आक्रांताओं से देश जो बचाया है। इस जन हस्ताक्षर अभियान के दौरान सुभाष कला संगम के द्वारा निदेशक हरीश महावर के नेतृत्व में चेतना शाक्यवाल, प्रभा चौहान, लीला पांचाल, प्रीति अग्रवाल और प्रदीप अग्रवाल ने अरावली पर्वत माला के दोहन से होने वाले भौगौलिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणामों को नुक्कड़ नाटक के द्वारा प्रदर्शित किया गया। इस अवसर यज्ञदत्त हाड़ा, डॉ. सुधीर गुप्ता, गौरव भटनागर, हनी सक्सेना, राकेश पुरुस्वानी, अमित सूद सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे । उपस्थित सैकड़ों लोगों और बच्चों ने उत्साह और जोश से अपने हस्ताक्षर करके सर्वोच्चय न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज किया तथा अरावली बचाओं- देश बचाओं, अरावली रहेगी तो देश रहेगा, हमारी पहचान अरावली देश की शान, जैसे गगन चुम्बी नारे लगाये । यज्ञदत्त हाड़ा ने बताया की इस हस्ताक्षर युक्त बैनर को केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव जी को प्रेक्षित किया जायेगा और अनुरोध किया जायेगा की माननीय न्यायालय से निवेदन करे की अपना आदेश देश और पर्यावरण हित में वापस ले |

 

 

 

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