कुछ दाग सृष्टि के चलायमान रहने के लिए अच्छे है
शी……………कोई सुन लेगा ऐसी बातें सबके सामने नहीं करते | चुप-चाप जो में बता रही हूँ वैसे कर लेना और किसी को बताना नहीं, न पूजा घर में जाना, न पूजा करना, न भगवान को हाथ लगाना न मटकी को, न पापड़ आचार को छूना और अगर ठीक न लग रहा हो तो स्कूल मत जाना, अब तू बड़ी हो गई है इसलिए बाहर खेलना बंद और भी न जाने कौन-कौन सी बातें जुडी है मासिक धर्म से जिसे आम भाषा में पीरियड्स, रजस्वला भी कहा जाता है | ये सब कुछ भेदभाव, धर्म, रीति-रिवाज, परम्परा के नाम पर उस महिला के साथ होता है जो खुद देवी का स्वरुप कहलाती है और विडंबना देखिये उसी देवी की पूजा करने के लिए समाज में प्रत्यक्ष रूप से जीती-जागती महिलाओं न बच्चियों को मना कर दिया है | जबकि मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वासों का कोई तर्क नहीं है | मासिक धर्म से सम्बंधित अनगिनत मिथ्यों को तोड़ने, समाप्त करने और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के महत्व के विषय में जाग्रति उत्पन्न करने के उद्देश्य से आज मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है और इसके लिए 28 मई का दिन ही प्रतीकात्मक रूप से इसलिए चुना गया क्योंकि मई साल का 5 वा माह होता है और साधारणतया महिलाओं को मासिक धर्म 5 दिनों के लिए होता है जिसका मासिक चक्र 28 दिन का रहता है | इस मासिक धर्म स्वच्छता दिवस की शुरुआत 2014 में जर्मनी के एन जी ओ वाश यूनाइटेड के द्वारा की गई थी | इस दिन आम तौर पर समाज में व्याप्त माहवारी से सम्बंधित अंधविश्वास, भ्रांतियाँ, रूढिया आदि को दूर करने की शपथ ली जाती है क्योंकि आज भी हमारे समाज में मासिक धर्म को लेकर अनेकों अनेक भ्रांतियाँ फैली हुई जिसके कारण महिलाओं को असंख्य घटक समस्याओं और जानलेवा बिमारियों का सामना करना पड़ता है |
देखा जाये तो यह माहवारी ही महिला के जीवन का वह सबसे मूल्यवान गहना है जो उसे सृष्टि का सर्वोत्तम सुख, मातृत्व प्रदान करता है | स्वास्थ्य मासिक धर्म के आधार पर ही कोई भी महिला माँ बन सकती है इसलिए इसे ईश्वर का वरदान समझना चाहिए न की कोई बीमारी या अभिश्राप | भगवान क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि की संरचना स्वयं नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने नारी की संरचना की और यदि किसी लड़की को स्वस्थ्य मासिक धर्मं नियमित रूप से न आते हो तो वह लड़की कभी प्राकृतिक रूप से माँ भी नहीं बन सकती | पृथ्वी पर सबसे बड़ा दान रक्तदान माना जाता है क्योंकि वो किसी इंसान की जान बचा सकता है और ईश्वर ने महिलाओं को हर माह रक्तदान करने कि शक्ति इंसान को जन्म देने के लिए प्रदान की है | इसीलिए मासिक धर्म को कोई बीमारी न समझे या उसे बुरी दृष्टि से न देखे | मासिक धर्म को सम्मान की दृष्टि से देखा जाये न की श्राप की दृष्टि से | महिला, परिवार और समाज के सभी सदस्यों को यह समझना चाहिए की मानव की उत्पत्ति माहवारी के बिना संभव ही नहीं है | अतः माहवारी या मासिक धर्म गर्व की बात है ना कि शर्म, हीनता, तनाव, कुंठा आदि की |
महिला के पूरे जीवन के स्वस्थ्य शरीर की बनावट के लिए माहवारी का नियमित होना जरुरी है जिसके लिए नियमित व्यायाम करना आवश्यक है | समाज के लोगों को यह समझना होगा चाहे वह महिला हो या पुरुष की हर दाग बुरा नहीं होता हमारे जीवन में कुछ निशान और दाग ऐसे भी होते है जो सृजन की शक्ति रखते गई और उनमे से ही एक है माहवारी का निशान | मासिक धर्म को समाज द्वारा बुरा समझ कर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है उन पर विभिन्न प्रकार की पारिवारिक, धार्मिक और सामाजिक बाध्यता लगा दी जाती है जबकि असम में माँ कामाख्यां देवी का मंदिर है जहाँ माता की पूजा मासिक धर्म आने की विशेषता के कारण ही होती है | उनके रक्तवर्णी वस्त्र को पुजारियों द्वारा प्रसाद के रूप में श्रद्धालु-भक्तों में विशेष रूप से वितरित किया जाता है जिसे वे अपने घरों कारोबार में पूजा स्थल पर रखते है लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए देश विदेश से आते है तो जब मासिक धर्म के समय मंदिर में विराजित माँ कामाख्या पवित्र हो सकती है तो हमारे आपके घरों विद्यमान आम महिलायें कैसे अपवित्र या अशुद्ध हो जाती है | जब हम उन दिनों पानी, प्रकाश, धरती, हवा, शिक्षा, के साथ कोई भेद भाव नहीं करते तो धार्मिक कार्यों से परहेज क्यों करे? जब असम की कामाख्या माता को पूजा जा सकता है तो हम क्यों समाज में फैले अतार्किक और व्यर्थ के रीति-रिवाजों का पालन करे | जबकि इस समय में खान- पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए खाना ऐसा होना चाहिए जिसमें आयरन और प्रोटीन की मात्रा अच्छी और गर्म पानी का सेवन करना चाहिए | भोजन में प्रचुर मात्रा में हरी सब्जियाँ, सलाद और फल खाने चाहिए |

भारत की बात करे तो देश में 355 मिलियन मासिक धर्म वाली महिलाओं की संख्या है, जो देश की आबादी का लगभग 30 प्रतिशत है जिनमें से 70 प्रतिशत माताओं ने मासिक धर्म को गंदा माना और 71 प्रतिशत किशोरियों को मासिक धर्म से पहले मासिक धर्म की जानकारी नहीं थी। 2014 की यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि तमिलनाडु में 79 प्रतिशत लड़कियां और महिलाएं मासिक धर्म स्वच्छता प्रथाओं से अनजान थीं। यह प्रतिशत उत्तर प्रदेश में 66 प्रतिशत, राजस्थान में 56 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 51 प्रतिशत था। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की 2011-12 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में केवल 38 प्रतिशत मासिक धर्म वाली लड़कियों ने अपनी माताओं से मासिक धर्म के बारे में बात की। यहाँ तक की माताएँ स्वयं इस बात से अनजान थीं कि मासिक धर्म होता क्या है? स्कूल भी बहुत मददगार नहीं थे क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूल मासिक धर्म स्वच्छता पर चर्चा करने से बचते थे। शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2015 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि गांवों के 63% स्कूलों में शिक्षकों ने मासिक धर्म और इससे कैसे निपटा जाए, इस पर कभी चर्चा नहीं की। ऐसे में एक किशोरी को यह कैसे समझाया जाए की मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कैसे किया जाये ।
मासिक धर्म के कारण ही बच्चियों कि शिक्षा रुक जाती है और कभी कभी वे परिवार वालों की सोच के कारण परीक्षाओं से भी वांछित हो जाती है | बहुत सारी बालिकाएं केवल इसी कारण से अपनी पढाई छोड़ देती है क्योंकि विद्यालय में शोचालय नहीं होते | 2014 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 23 मिलियन लड़कियां मासिक धर्म शुरू होने पर जल्दी स्कूल छोड़ देती हैं और उनमें से कई को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनके पास सेनेटरी नैपकिन खरीदने के पैसे नहीं होते, विद्यालयों के शौचालय अत्यधिक गंदे रहते है, वे ऐसे गंदे कपड़े का प्रयोग करती हैं जो स्वच्छ व संक्रमणरहित नहीं होता जिसकी वजह से वैजाइनल फंगल इनफैक्शन, सर्विकस कैंसर, यूट्रेस कैंसर होने की संभावना रहती है | 2011 की ए. सी. नेल्सन की रिपोर्ट के अनुसार केवल 12% भारतीय महिलाएं सेनेटरी नैपकिनका प्रयोग करती है जिसका प्रतिशत हालाँकि अब कुछ हद तक सुधर गया है किन्तु अभी भी हमें मासिक धर्म से सम्बंधित आडम्बरों , रीति रिवाजों को दूर करने के लिए एक सर्वव्यापी सशक्त मुहीम चलाने की आवश्यकता है |
मासिक धर्मं से जुड़ी वर्जनाओं,अन्धविश्वासों, भ्रांतियों पर आधारित है कई फिल्मों जैसे अरुणाचलम मुरुगानान्थम के चरित्र पर निर्मित पैडमैन, पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस के माध्यम से समाज में जागृति लाने का प्रयास किया जा रहा है | स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी में इस विषय पर संगोष्ठी, सेमिनार, कांफ्रेंस आयोजित की जाने लगी है | लोगों, महिलाओं और बच्चियों को यह समझाया जा रहा है की यह महिलाओं के जीवन से सम्बंधित यह एक जैविक विकास की प्रक्रिया है जिसमें किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है |
Dr. Nidhi Prajapati
President-Society Has Eve-SHE International Charitable Trust


